स्वामी विवेकानंद जीवन शैली का नामरूप है।


कोलकाता, 12 जनवरी । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज बेलुर मठ में सम्बोधन का मूल पाठ 
रामकृष्ण मठ के महासचिव श्रीमान स्‍वामी सुविरानंदा जी महाराज, स्‍वामी दिव्‍यानंद जी महाराज, यहां उपस्थित पूज्‍यसंतगण, अतिथिगण, मेरे युवा साथियो।


आप सभी को स्वामी विवेकानंद जयंती के इस पवित्र अवसर पर, राष्ट्रीय युवा दिवस पर, बहुत-बहुत शुभकामनाएं। देशवासियों के लिए बेलुड़ मठ की इस पवित्र भूमि पर आना किसी तीर्थयात्रा से कम नहीं है, लेकिन मेरे लिए तो हमेशा से ही ये घर आने जैसा ही है। मैं प्रेसीडेंट स्‍वामी का, यहां पर सभी व्‍यवस्‍थापकों का ह्दय से बहुत आभारी हूं कि मुझे कल रात यहां रहने के लिए इजाजत दी और सरकार का भी मैं आभारी हूं क्‍योंकि सरकार में प्रोटोकॉल, सिक्‍योरिटी ये भी इधर से उधर जाने नहीं देते। लेकिन मेरी Request को व्‍यवस्‍था वालों ने भी माना। और मुझे इस पवित्र भूमि में रात बिताने का सौभाग्‍य मिला। इस भूमि में, यहां की हवा में स्‍वामी राम कृष्‍ण परमहंस, मां शारदा देवी, स्‍वामी ब्रह्मानंद, स्‍वामी विवेकानंद सहित तमाम गुरुओं का सानिघ्‍य हर किसी को अनुभव हो रहा है। जब भी यहां बेलुड़ मठ आता हूं तो अतीत के वो पृष्‍ठ खुल जाते हैं। जिनके कारण आज मैं यहां हूं। और 130 करोड़ भारतवासियों की सेवा में कुछ कर्तव्‍य निभा पा रहा हूं।     


पिछली बार जब यहां आया था तो गुरुजी, स्वामी आत्मआस्थानंद जी के आशीर्वाद लेकर गया था। और मैं कह सकता हूं कि उन्‍होंने मुझे ऊंगली पकड़ कर जनसेवा ही प्रभुसेवा का रास्‍ता दिखाया। आज वो शारीरिक रूप से हमारे बीच विद्यमान नहीं हैं। लेकिन उनका काम, उनका दिखाया मार्ग, रामकृष्ण मिशन के रूप में सदा-सर्वदा हमारा मार्ग प्रशस्त करता रहेगा।


यहां बहुत युवा ब्रह्मचारी बैठे हैं मुझे उनके बीच कुछ पल बिताने का मौका मिला। जो मन:स्थिति आपकी है कभी मेरी भी हुआ करती थी। और आपने अनुभव किया होगा हममें से ज्‍यादा लोग यहां खींचे चले आते हैं उसका कारण विवेकानंद जी के विचार, विवेकानंद जी की वाणी, विवेकानंद जी का व्‍यक्तित्‍व हमें यहां तक खींचकर के ले आता है। लेकिन.... लेकिन.... इस भूमि में आने के बाद माता शारदा देवी का आंचल हमे बस जाने के लिए एक मां का प्‍यार देता है। जितने भी ब्रह्चारी लोग है सबको यही अनुभूति होती होगी। जो कभी मैं करता था।


साथियों, स्वामी विवेकानंद का होना सिर्फ एक व्यक्ति का होना नहीं है, बल्कि वो एक जीवन धारा का, जीवन शैली का नामरूप है। उन्होंने दरिद्रनारायण की सेवा और भारत भक्ति को ही अपने जीवन का आदि और अंत मान भी लिया, जी भी लिया और जीने के लिए आज भी करोड़ों लोगों को रास्‍ता भी दिखा दिया।