तपोभूमि लालीवाव मठ में साहित्य-समारोह


बांसवाड़ा Banswara, 13 जनवरी , साहित्यकारों का धर्म है कि वे ऐसे साहित्य का सृजन करें जो समाज को नई दशा व दिशा दें। समाज के नवनिर्माण में साहित्यकारों की विशेष भूमिका होती है। समाज हितकारी उद्देश्य के लिए स्थानीय साहित्यकार एक दूसरे से समय-समय पर संवाद संप्रेषण बनाएं रखें।


यह विचार तपोभूमि लालीवाव मठ के महंत हरिओमशरणदासजी महाराज ने श्रीनारायणदासजी महाराज सप्तदश स्मृति समारोह के दो दिवसीय आयोजन के तहत रविवार देर रात को सम्पन्न वार्षिक साहित्य समारोह क्षेत्र के कवि, शायरों, सुधी श्रद्धालुओं व आमजन को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।


महन्तजी ने अतीव प्रसन्नता व्यक्त की कि उर्दू शायर अपनी रचनाओं में उर्दू के साथ-साथ राष्ट्रभाषा हिन्दी के शब्दों को तथा हिन्दी के कवि-गीतकार अपनी रचनाओं में उर्दू शब्दों को वाँछनीय प्रयोग कर अद्भुत प्रभाव से श्रोताओं को रूबरू करवा रहे हैं। यह भाषागत उदारता कबीर, रहीम, रसखान, मीरा, तुलसी की गौरवमयी साहित्यिक सृजन की स्मृति दिलाता है। इसी दिशा में क्षेत्र के समस्त साहित्यकारों का विचार-मंथनपरक ‘वार्षिक साहित्य समारोह’ का आयोजन किया जाता है।उन्होंने कहा कि साहित्यधर्म को अंगीकार करने के साथ व्यक्ति की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। साहित्यधर्म पर चलना बड़ी जिम्मेदारी का काम होता है।


समारोह की अध्यक्षता गोविन्द गुरु राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय की प्राचार्य डाॅ. सरला पण्ड्या ने की। जबकि विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार भूपेन्द्र उपाध्याय ‘तनिक’, पार्षद सज्जनसिंह राठौड़ व प्रसिद्ध शायर-लेखक सईद मंजर थे। कार्यक्रम की शुरूआत मधुर स्वर के धनी तारेश दवे द्वारा प्रस्तुत ‘कब कहां मैने तू, मुझको शहर में नाम दे, राह तेरी चल सकू बस इक ऐसा काम दे... माँ शारदे....’ सरस्वती वंदना से हुई। डॉ. सरला पंड्या ने स्वामी विवेकानंद को केंद्रित करते हुए अपनी काव्य रचना स्वामी विवेकानंद युग के प्रखर पुरुष हैं... प्रस्तुत की। उन्होंने युवाओं से सही मार्ग पर चलने की अपील की। भूपेंद्र उपाध्याय ‘तनिक’ ने पत्ती-पत्ती, डाल-डाल पर लिखा हुआ है नाम तुम्हारा...’ रचना प्रस्तुत की।


अँचल के वरिष्ठ प्रयोगधर्मी कवि और जीजीटीयू कुलगीत रचयिता कवि हरीश आचार्य ने अपनी रचना प्रस्तुति के दौरान कहा कि साहित्यकारों को अपनी प्रस्तुति के दौरान संयम, धीरे और विवेकपूर्ण रूप से अभिव्यक्त करें। गीतकार आचार्य ने ‘कृष्णं वन्दे जगदगुरु राग अलापती रहती है, हम उस अँचल के वासी हंै, जहां दिलों में माही बसती है।’ जैसे भावपूर्ण गीत की अभिव्यक्ति दी। आध्यात्मिक भजन गायक विरेन्द्र सिंह राव ने राग दरबारी में ‘और नहीं कछु काम के, भरोसे अपने राम के’ तथा ‘मन लाग्यो मेरो यार फकीरी में’ जैसी सूफियाना भजन की अभिव्यक्ति दी।


कवि और रंगमंचकर्मी सतीश आचार्य ने गुरुवर तेरे दरबार में खड़ा हूं..., डाॅ. दीपक द्विवेदी ने अपनी व्यंग और संदेश परक काव्य रचना कुछ हजार पक्षी ही तो मरे हैं क्या फर्क पड़ता है, जंगल को ही तो आग लगी है क्या फर्क पड़ता है सुना कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। कवि तारेश दवे ने मुझे एक तेरे साथ की दरकार है..., जहीर आतीश ने फूलों का प्रलोभन खुश्बू का अभिनंदन... और शायर सईद मंजर ने हवा रुके तो दम घुटता है..., अशोक मदहोश ने क्या करें जमाना साथ देता...’ भंवर गर्ग ने बद से भी बदतर लगता है, गांव भी अब शहर लगता है..., प्रस्तुत की। वहीं पार्षद सज्जन सिंह ने स्वामी विवेकानन्द के आदर्श पर चलने का आह्वान किया।


हेमन्त पाठक ‘राही’ ने ‘कलम कहती है यू ही लिख...’, उत्सव जैन ने ‘डाबी आदमी ई बणावी आदमी ने हाथ मे रई गई...’ मेहूल चैबीसा ने ‘बिन गुरु जीवन अधुरा...’, रौनक पुरोहित ने ‘ब्रह्मा, विष्णु गुण गाते है...’, कपिल गुर्जर ने ‘जिन्दगी जब भी मिलूं तुझसे...’, हिमेश उपाध्याय ने ‘रगों में दौड़ते लहू को क्या बदल दोगे...’ उत्तम मेहता ने ‘ हसरतों को और बेज़ार मत कर...’, महेश पंचाल ‘माही’ ने ‘हो समर्थन या विरोध भले...’, संदेश जैन ने ‘चलो पूछे सियासत से...’, वसी सिद्दीकी ने ‘जिन्दगी में हरेक पल एक आनन्द चाहिए...’ प्रस्तुत की।


इस अवसर पर विमल भट्ट, दिनेश पण्ड्या, छत्रपाल, सियाराम महाराज, कनु सोलंकी, अरविंद खेरावत, मनोहर मेहता, नरेश भट्ट, विनोद तेली, महेश राणा, दीपक तेली आदि मौजुद थे। संचालन डाॅ. दीपक द्विवेदी ने किया जबकि आभार मृदुल पुरोहित ने माना।