आखिर दोष क्या था साधुओं का



   ----  सुबोध जैन -----
     एक तरफ जब समूची दुनिया कोरोना के दर्द से कराह रही है तब महाराष्ट्र के पालघर जिले के कासना इलाके में बीती 17अप्रैल की रात एक भीड़ ने दो साधुओं और उनकी गाड़ी के चालक की लाठियों से पीट पीट कर हत्या कर दी।
 ये साधु अपने गुरु के अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिए सूरत जा रहे थे तभी राह में यह हृदय विदारक घटना घट गई। बात तो यह है कि दो साधुओं में से एक तो वृद्ध थे। उनकी उम्र साठ साल से अधिक थी। मुख्य सड़क मार्ग पर पुलिस द्वारा रोके जाने पर वे गांवो के रास्ते से जा रहे थे ताकि सुरक्षित सूरत तक पहुंच सके। कासना इलाके में अचानक भीड़ ने इन्हे घेर लिया। 


बचाव के लिए पुलिस को सूचना दी गई ओर पुलिस पहुंची भी लेकिन भीड़ के आगे हथियार डाल कर भाग खड़ी हुई। भीड़ ने दो साधुओं ओर उनके ड्राईवर को मौत की नींद सुला दिया। पुलिस ने बाद में घटना को अंजाम देने वाले  100 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है और महाराष्ट्र सरकार ने सीआईडी की अपराध शाखा से घटना की जांच कराने की घोषणा कर दी। कितनी दर्दनाक घटना रही होगी यह जब भीड़ के हाथों वे निर्दोष लोग मारे गए जबकि उनके हृदय में कभी कोई अपराध रहा ही नहीं होगा। अपराध रोकने के लिए तैयार की गई पुलिस हथियार डाल कर भाग खड़ी हुई। हत्यारों के साथ पुलिस भी इस कायराना व्यवहार के लिए दोषी है। पुलिस को जब बताया गया था कि वहां भीड़ हमला कर रही है तो पुलिस हथियार और बल के साथ क्यों नहीं गई।
    
  दिवंगत साधु अपने गैरूए वस्त्रों में ही थे।भीड़ ने तब भी ठहरने के बजाय निर्दोष की हत्या जैसे जघन्य अपराध को कारित किया। इससे अपराध की गम्भीरता कम नहीं होती लेकिन हैरत इस बात की है कि देशभर में कानून और संविधान की रक्षक ताकतों की प्रतिक्रिया सामने नहीं आ रही। शुरुआत के दो दिन तक तो लोगों को यह समझ ही नहीं आया की साधुओं की हत्या क्यों की गई। आखिर इन साधुओं से किन को खतरा था? क्या साधुओं को संविधान ओर कानून के तहत जीवन रक्षा के अधिकार से बाहर किया हुआ था। 


क्या वे अपराधी थे। आखिरकार तीसरे दिन इस घटना ने तूल पकड़ा जब इससे संबंधित एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक पुलिसकर्मी के साथ साधु बाहर आता हुआ दिखता है और फिर भीड़ उस साधु पर टूट पड़ती है और उसे लाठियों से पीट-पीटकर मार डाला जाता है। अब सवाल यह उठता है कि यदि पुलिस मौके पर मौजूद थी तो उन्होंने भीड़ को रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया? इस घटना के पीछे भी कोई अफवाह काम कर रही थी। भीड़ यह मान रही थी कि साधुओं के भेष में यह लुटेरे हो सकते हैं। यह अफवाह वाली बात भी घटना के अगले ही दिन विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई थी लेकिन तब इस घटना को बहुत छोटा और साधारण माना गया।


असल में घटना की गंभीरता वीडियो के वायरल होने के बाद सामने आई तो हिंदू संगठनों की चेतना लौटने लगी और धीरे-धीरे विरोध के स्वर उठने लगे तब यह मुद्दा फेसबुक और व्हाट्सएप पर भी दिखने लगा। पूरे देश में बीते कई दिनों से लॉक डाउन चल रहा है ऐसे में साधुओं का मुंबई से सूरत (गुजरात) की तरफ यात्रा करना कितना सही था और कितना गलत यह तो भीड़तंत्र ने अपने फैसले से अवगत करा ही दिया है। लेकिन एक 60 साल से अधिक उम्र के व्यक्ति से किसी तरह की लूट की अपेक्षा करना क्या सरल और सहज था परंतु आतताइयों ने निर्ममता पूर्वक दोनों साधु और कार चालक की हत्या को अंजाम दे डाला। 


चौंकाने वाली बात यह भी है कि उसी भीड़तंत्र के हिस्से में से किसी एक ने घटना को बाकायदा मोबाइल के कैमरे से कैद किया और फिर उसे वायरल भी किया। वीडियो वायरल होने के बाद महाराष्ट्र की अघाड़ी सरकार की नींद टूटी और उन्होंने आनन-फानन में घटना की जांच के आदेश दे दिए। तब तक इस मुद्दे पर राजनीति भी शुरू हो गई और कई हिंदू संगठनों ने इसे रंग देने का प्रयास भी किया।



देश में बीते 3 सालों में मॉब लिंचिंग की घटनाएं जिस तरीके से बड़ी है वह निश्चित रूप से चिंताजनक है साथ ही इस विषय पर सर्वोच्च न्यायालय भी कड़ी टिप्पणियां करता रहा है बावजूद इसके भीड़तंत्र के द्वारा हाथों हाथ न्याय या अन्याय करने के पीछे की मानसिकता अभी भी समझ से परे है। पालघर में हुई इन साधुओं की निर्मम हत्या से एक बात तो तय है कि भीड़ तंत्र में ऐसा कोई खुराफाती जरूर था जिसने लोगों को उकसाया और घटना को अंजाम दिया गया। भीड़ को उकसाने के पीछे उनकी क्या मानसिकता रही होगी अब यह तो जांच का विषय है लेकिन अंतिम संस्कार में जा रहे साधुओं का ही  असमय अंतिम संस्कार होना विचलित जरूर करता है। घटना का ऐसे समय होना जब देश में लोगों की आवाजाही बंद थी ऐसे में एकाएक सैकड़ों लोगों की भीड़ सड़क पर जमा होती है और निर्दयता पूर्वक साधुओं को मौत के घाट उतार देती है। 


वैसे तो लॉक डाउन के दरमियान चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा व्यवस्था की बात कही जा रही है लेकिन इस घटना से यह सिद्ध होता है कि सुरक्षा एक तरफ धरी रह गई और खाकी वर्दी भी मौका ए वारदात पर मौजूद होते हुए भी साधुओं को नहीं बचा सकी। अब जाने वाला तो चला गया लेकिन विश्व के इस सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में इस तरह की घटनाएं दिलों को न सिर्फ कचोट रही है अपितु भय वह तनाव भी पैदा कर रही है। इस तरह की घटनाओं से वर्ग संघर्ष को भी बढ़ावा मिल रहा है और लगता है कि कानून हाथ पर हाथ धरे बैठा है। 


घटना होने के बाद वारदात स्थल पर पुलिस का पहुंचना तो आम बात है पर इस घटना के समय घटना स्थल पर पुलिस की मौजूदगी और उसके बाद अपराध को अंजाम देना कई तरह के सवाल खड़ा करते हैं। लगता है देश में कानून का भय समाप्त होने लगा है या लोगों की सहनशक्ति घटने लगी है। दोनों ही परिस्थितियों में यह खतरनाक हालातों को इंगित करती है। इस समय महाराष्ट्र में कांग्रेस ओर राष्ट्रवादी कांग्रेस के समर्थन से शिवसेना के नेतृत्व वाली सरकार है तो क्या कांग्रेस इस सरकार को समर्थन देने की जिम्मेदारी का अहसास करेगी ओर समर्थन वापिस लेने का फैसला करेगी। कांग्रेस इस घटना को कितनी गंभीरता से लेती है यह आने वाला समय बताएगा। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार अपने प्रयासों से बनाई गई उद्धव ठाकरे सरकार की इस नाकामी का जिम्मा ओड़ेंगे। यदि नहीं तो इसका क्या मतलब होगा की राजनीति हमेशा ही गैर जिम्मेदार ओर दोहरे  मापदंडों पर चलने वाला एक ढर्रा ही साबित होगा। राजनीति का यह बदसूरत चेहरा आखिर कब तक दिखाई देता रहेगा।
    
  लिंचिंग की घटनाओं को समाप्त करने के लिए क्या इस तरह से चेहरा छिपा लेना सही होगा या फिर आगे बढ़कर नसीहती कदम उठाना जरूरी होगा। साधुओं की हत्या की घटना में पुलिस भी कम दोषी नहीं है, इन्हें ऐसी कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए ताकि आने वाले समय में वह एक नजीर बने हैं। देश के राजनीतिक वातावरण पर भी अफसोस होता है। 


एक तरफ कोरोना का संकट दूसरी तरफ इस तरह की घटनाएं आखिर क्या संदेश दे रही है। इतनी वीभत्स घटना पर भी किसी को लोकतंत्र ओर संविधान साथ ही मौलिक अधिकार पर कोई संकट नजर नहीं आ रहा। आने वाले समय के लिए देश के लिए यह शुभ संकेत नहीं है।
:— लेखक के अपने विचार है ।